मंगलवार, 2 सितंबर 2008

हाशिमपुरा/ विभूति नारायण राय (आई•पी•एस•)


जीवन के कुछ अनुभव ऐसे होतें हैं जो जिन्दगी भर आपका पीछा नहीं छोडतें . एक दु:स्वप्न की तरह वे हमेशा आपके साथ चलतें हैं और कई बार तो कर्ज की तरह आपके सर पर सवार रहतें हैं. हाशिमपुरा भी मेरे लिये कुछ ऐसा ही अनुभव है. 22/23 मई सन 1987 की आधी रात दिल्ली गाजियाबाद सीमा पर मकनपुर गाँव से गुजरने वाली नहर की पटरी और किनारे उगे सरकण्डों के बीच टार्च की कमजोर रोशनी में खून से लथपथ धरती पर मृतकों के बीच किसी जीवित को तलाशना- सब कुछ मेरे स्मृति पटल पर किसी हॉरर फिल्म की तरह अंकित है.
उस रात द्स-साढे दस बजे हापुड से वापस लौटा था. साथ जिला मजिस्ट्रेट नसीम जैदी थे जिन्हें उनके बँगले पर उतारता हुआ मैं पुलिस अधीक्षक निवास पर पहुँचा. निवास के गेट पर जैसे ही कार की हेडलाइट्स पडी मुझे घबराया हुआ और उडी रंगत वाला चेहरा लिये सब इंसपेक्टर वी•बी•सिंह दिखायी दिया जो उस समय लिंक रोड थाने का इंचार्ज था. मेरा अनुभव बता रहा था कि उसके इलाके में कुछ गंभीर घटा है. मैंने ड्राइवर को कार रोकने का इशारा किया और नीचे उतर गया.
वी•बी•सिंह इतना घबराया हुआ था कि उसके लिये सुसंगत तरीके से कुछ भी बता पाना संभव नहीं लग रहा था. हकलाते हुये और असंबद्ध टुकडों में उसने जो कुछ मुझे बताया वह स्तब्ध कर देने के लिये काफी था. मेरी समझ में आ गया कि उसके थाना क्षेत्र में कहीं नहर के किनारे पी•ए•सी• ने कुछ मुसलमानों को मार दिया है. क्यों मारा? कितने लोगों को मारा ? कहाँ से लाकर मारा ? स्पष्ट नहीं था. कई बार उसे अपने तथ्यों को दुहराने के लिये कह कर मैंने पूरे घटनाक्रम को टुकडे-टुकडे जोडते हुये एक नैरेटिव तैयार करने की कोशिश की. जो चित्र बना उसके अनुसार वी•बी•सिंह थाने में अपने कार्यालय में बैठा हुआ था कि लगभग 9 बजे उसे मकनपुर की तरफ से फायरिंग की आवाज सुनायी दी. उसे और थाने में मौजूद दूसरे पुलिस कर्मियों को लगा कि गाँव में डकैती पड रही है. आज तो मकनपुर गाँव का नाम सिर्फ रेवेन्यू रिकार्ड्स में है . आज गगनचुम्बी आवासीय इमारतों, मॉल और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों वाले मकनपुर में 1987 में दूर-दूर तक बंजर जमीन पसरी हुयी थी. इसी बंजर जमीन के बीच की एक चक रोड पर वी•बी•सिंह की मोटर सायकिल दौडी. उसके पीछे थाने का एक दारोगा और एक अन्य सिपाही बैठे थे. वे चक रोड पर सौ गज भी नहीं पहुँचे थे कि सामने से तेज रफ्तार से एक ट्रक आता हुआ दिखायी दिया. अगर उन्होंने समय रहते हुये अपनी मोटर सायकिल चक रोड से नीचे न उतार दी होती तो ट्रक उन्हें कुचल देता. अपना संतुलन संभालते-संभालते जितना कुछ उन्होंने देखा उसके अनुसार ट्रक पीले रंग का था और उस पर पीछे 41 लिखा हुआ था, पिछली सीटों पर खाकी कपडे पहने कुछ लोग बैठे हुये दिखे.किसी पुलिस कर्मी के लिये यह समझना मुश्किल नहीं था कि पी•ए•सी• की 41 वीं बटालियन का ट्रक कुछ पी•ए•सी• कर्मियों को लेकर गुजरा था. पर इससे गुत्थी और उलझ गयी. इस समय मकनपुर गाँव में पी•ए•सी• का ट्रक क्यों आ रहा था ? गोलियों की आवाज के पीछे क्या रहस्य था ? वी•बी•सिंह ने मोटर सायकिल वापस चक रोड पर डाली और गाँव की तरफ बढा. मुश्किल से एक किलोमीटर दूर जो नजारा उसने और उसके साथियों ने देखा वह रोंगटे खडा कर देने वाला था मकनपुर गाँव की आबादी से पहले चक रोड एक नहर को काटती थी. नहर आगे जाकर दिल्ली की सीमा में प्रवेश कर जाती थी. जहाँ चक रोड और नहर एक दूसरे को काटते थे वहाँ पुलिया थी. पुलिया पर पहुँचते- पहुँचते वी•बी•सिंह के मोटर सायकिल की हेडलाइट जब नहर के किनारे उस सरकंडे की झाडियों पर पडी तो उन्हें गोलियों की आवाज का रहस्य समझ में आया. चारों तरफ खून के धब्बे बिखरे पडे थे. नहर की पटरी, झाडियों और पानी के अन्दर ताजा जख्मों वाले शव पडे थे. वी•बी•सिंह और उसके साथियों ने घटनास्थल का मुलाहिजा कर अन्दाज लगाने की कोशिश की कि वहाँ क्या हुआ होगा ? उनकी समझ में सिर्फ इतना आया कि वहाँ पडे शवों और रास्ते में दिखे पी•ए•सी• की ट्रक में कोई संबन्ध जरूर है. साथ के सिपाही को घटनास्थल पर निगरानी के लिये छोडते हुये वी•बी•सिंह अपने साथी दारोगा के साथ वापस मुख्य सडक की तरफ लौटा. थाने से थोडी गाजियाबाद-दिल्ली मार्ग पर पी•ए•सी• की 41वीं बटालियन का मुख्यालय था. दोनो सीधे वहीं पहुँचे. बटालियन का मुख्य द्वार बंद था .काफी देर बहस करने के बावजूद भी संतरी ने उन्हें अंदर जाने की इजाजत नहीं दी. तब वी•बी•सिंह ने जिला मुख्यालय आकर मुझे बताने का फैसला किया.जितना कुछ आगे टुकडों टुकडों में बयान किये गये वृतांत से मैं समझ सका उससे स्पष्ट हो ही गया था कि जो घटा है वह बहुत ही भयानक है और दूसरे दिन गाजियाबाद जल सकता था. पिछले कई हफ्तों से बगल के जिले मेरठ में सांप्रादायिक दंगे चल रहे थे और उसकी लपटें गाजियाबाद पहुँच रहीं थीं.मैंने सबसे पहले जिला मजिस्ट्रेट नसीम जैदी को फोन किया. वे सोने ही जा रहे थे. उन्हें जगने के लिये कह कर मैंने जिला मुख्यालय पर मौजूद अपने एडिशनल एस•पी•, कुछ डिप्टी व्स•पी• और मजिस्ट्रेटों को जगाया और तैयार होने के लिये कहा. अगले चाली-पैंतालीस मिनटों में सात-आठ वाहनों में लदे-फंदे हम मकनपुर गाँव की तरफ लपके. नहर की पुलिया से थोडा पहले हमारी गाडियाँ खडीं हो गयीं. नहर के दूसरी तरफ थोडी दूर पर ही मकनपुर गाँव की आबादी थी लेकिन तब तक कोई गाँव वाला वहाँ नहीं पहुँचा था. लगता था कि दहशत ने उन्हें घरों में दुबकने को मजबूर कर दिया था. थाना लिंक रोड के कुछ पुलिस कर्मी जरूर वहाँ पहुँच गये थे. उनकी टार्चों की रोशनी के कमजोर वृत्त नहर के किनारे उगी घनी झाडियों पर पड रहे थे पर उअनसे साफ देख पाना मुश्किल था. मैंने गाडियों के ड्राइवरों से नहर की तरफ रुख करके अपने हेडलाइट्स ऑन करने के लिये कहा. लगभग सौ गज चौडा इलाका प्रकाश से नहा उठा. उस रोशनी में मैंने जो कुछ देखा वह वही दु;स्वप्न था जिसका जिक्र मैंने शुरु में किया है.
गाडियों की हेडलाइट्स की रोशनियाँ झाडियों से टकरा कर टूट टूट जा रहीं थीं इसलिये टार्चोंं का भी इस्तेमाल करना पड रहा था. झाडियों और नहरों के किनारे खून के थक्के अभी पूरी तरह से जमे नहीं थे , उनमें से खून रिस रहा था. पटरी पर बेतरतीबी से शव पडे थे- कुछ पूरे झाडियों में फंसे तो कुछ आधे तिहाई पानी में डूबे. शवों की गिनती करने या निकालने से ज्यादा जरूरी मुझे इस बात की पडताल करना लगा कि उनमें से कोई जीवित तो नहीं है. सबने अलग-अलग दिशाओं में टार्चों की रोशनियाँ फेंक फेंक कर अन्दाज लगाने की कोशिश की कि कोई जीवित है या नहीं. बीच बीच में हम हांक भी लगाते रहे कि यदि कोई जीवित हो तो उत्तर दे. हम दुश्मन नहीं दोस्त हैं. उसे अस्पताल ले जायेंगे. पर कोई जवाब नहीं मिला. निराश होकर हममें से कुछ पुलिया पर बैठ गये.मैंने और जिलाधिकारी ने तय किया कि समय खोने से कोई लाभ नहीं है. हमें दूसरे दिन की रणनीति बनानी थी इसलिये जूनियर अधिकारियों को शवों को निकालने और जरूरी लिखा-पढी करने के लिये कह कर हम लिंक रोड थाने के लिये मुडे ही थे कि नहर की तरफ से खाँसने की आवाज सुनायी दी. सभी ठिठक कर रुक गये. मैं वापस नहर की तरफ लपका. फिर मौन छा गया. स्पष्ट था कि कोई जीवित था लेकिन उसे यकीन नहीं था कि जो लोग उसे तलाश रहें हैं वे मित्र हैं. हमने फिर आवाजें लगानी शुरू कीं, टार्च की रोशनी अलग-अलग शरीरों पर डालीं और अंत में हरकत करते हुये एक शरेर पर हमारी नजरें टिक गयीं. कोई दोनो हाथों से झाडियाँ पकडे आधा शरीर नहर में डुबोये इस तरह पडा था कि बिना ध्यान से देखे यह अन्दाज लगाना मुश्किल था कि वह जीवित है या मृत ! दहशत से बुरी तरह वह काँप रहा और काफी देर तक आश्वस्त करने के बाद यह विश्वास करने वाला कि हम उसे मारने नहीं बचाने वालें हैं, जो व्यक्ति अगले कुछ घंटे हमे इस लोमहर्षक घटना की जानकारी देने वाला था, उसका नाम बाबूदीन था.गोली उसे छूते हुये निकल गयी थी.भय से वह नि;श्चेष्ट होकर वह झाडियों में गिरा तो भाग दौड में उसके हत्यारों को यह जाँचने का मौका नहीं मिला कि वह जीवित है या मर गया. दम साधे वह आधा झाडियों और आधा पानी में पडा रहा और इस तरह मौत के मुँह से वापस लौट आया. उसे कोई खास चोट नहीं आयी थी और नहर से चलकर वह गाडियों तक आया. बीच में पुलिया पर बैठकर थोडी देर सुस्ताया भी. लगभग 21 वर्षों बाद जब हाशिमपुर पर एक किताब लिखने के लिये सामग्री इकट्ठी करते समय मेरी उससे मुलाकात हुयी जहाँ पी•ए•सी• उसे उठा कर ले गयी थी तो उसे याद था कि पुलिया पर बैठे उसे किसी सिपाही से माँग कर बीडी दी थी. बाबूदीन ने जो बताया उसके अनुसार उस दिन अपरान्ह तलाशियों के दौरान पी•ए•सी• के एक ट्रक पर बैठाकर चालीस पचास लोगों को ले जाया गया तो उन्होंने समझा कि उन्हें गिरफ्तार कर किसी थाने या जेल ले जाया जा रहा है. मकनपुर पहुँचने के लगभग पौन घण्टा पहले एक नहर पर ट्रक को मुख्य सडक से उतारकर नहर की पटरी पर कुछ दूर ले जाकर रोक दिया गया. पी•ए•सी• के जवान कूद कर नीचे उतर गये और उन्होंने ट्रक पर सवार लोगों को नीचे उतरने का आदेश दिया. अभी आधे लोग ही उतरे थे कि पी•ए•सी• वालों ने उनपर फायर करना शुरु कर दिया. गोलियाँ चलते ही ऊपर वाले गाडी में ही दुबक गये. बाबू दीन भी उनमें से एक था.बाहर उतरे लोगों का क्या हुआ वह सिर्फ अनुमान ही लगा सकता था. शायद फायरिंग की आवाज आस पास के गाँवों में पहुँची जिसके कारण आस पास से शोर सुनायी देने लगा और पी•ए•सी• वाले वापस ट्रक में चढ गये. ट्रक तेजी से बैक हुआ और वापस गाजियाबाद की तरफ भागा. यहाँ वह मकनपुर वाली नहर पर आया और एक बार फिर सबसे उतरने के लिये कहा गया. इस बार डर कर ऊपर दुबके लोगों ने उतरने से इंकार कर दिया तो उन्हें खींच खींच कर नीचे घसीटा गया. जो नीचे आ गये उन्हें पहले की तरह गोली मारकर नहर में फेंक दिया गया और जो डर कर ऊपर दुबके रहे उन्हें ऊपर ही गोली मारकर नीचे ढकेला गया. बाबूदीन जब यह विवरण बता रहा था तो हमने पहले घटनास्थल का अन्दाज लगाने की कोशिश की . किसी ने सुझाव दिया कि पहला घटनास्थल मेरठ से गाजियाबाद आते समय रास्ते में मुरादनगर थाने में पडने वाली नहर हो सकती है. मैंने लिंक रोड थाने के वायरलेस सेट से मुरादनगर थाने को कॉल किया तो स्पष्ट हुआ कि हमारा सोचना सही था. कुछ देर पहले ही मुरादनगर थाने को भी ऐसी ही स्थिति से गुजरना पडा था . वहाँ भी कई मृत शव नहर में पडे मिले थे और कुछ लोग जीवित थाने लाये गये थे.
इसके बाद की कथा एक लंबा और यातनादायक प्रतीक्षा का वृतांत है जिसमें भारतीय राज्य और अल्पसंख्यकों के रिश्ते, पुलिस का गैर पेशेवराना रवैया और घिसट घिसट कर चलने वाली उबाऊ न्यायिक प्रणाली जैसे मुद्दे जुडे हुयें हैं. मैंने 22 मई 1987 को जो मुकदमें गाजियाबाद के थाना लिंक रोड और मुरादनगर पर दर्ज कराये थे वे पिछले 21 वर्षों से विभिन्न बाधाओं से टकराते हुये अभी भी अदालत में चल रहें हैं और अपनी तार्किक परिणति की प्रतीक्षा कर रहें हैं


लेखक श्री विभूति नारायण राय,1975 बैच के एक वरिष्ठ आई•पी•एस• अधिकारी है.

8 टिप्‍पणियां:

Rakesh Kaushik ने कहा…

hmari nayay prnali me bahut si kamiyan hai. unhe door karne ke liye kuch jaroor karna chiye. bhagwaan se dua hai ke natija aapke paksh me aaye


ab lekh likhne par: kya sajeev chitran kiya hai aapne
adbhut

Rakesh Kaushik

manvinder bhimber ने कहा…

aapko jeh bhi pata haoga ki sabhi musalmaan Meerut ke Hashimpura ke tha....
Mai us din Hashimpur ki galiuo mai reporting ke liye pahunchi thee...bada bura manjar thaaa,,,
ek police adhkaari ne PAC ko raka lekin PAc ke jawaan ne unhi per nishana dikhuya....wo manjar mujhe kai dbi tak nahi bhoola tha.
khair ....system hi essa ho to kya kahiyega

manvinder bhimber ने कहा…

aapko jeh bhi pata haoga ki sabhi musalmaan Meerut ke Hashimpura ke tha....
Mai us din Hashimpur ki galiuo mai reporting ke liye pahunchi thee...bada bura manjar thaaa,,,
ek police adhkaari ne PAC ko raka lekin PAc ke jawaan ne unhi per nishana dikhuya....wo manjar mujhe kai dbi tak nahi bhoola tha.
khair ....system hi essa ho to kya kahiyega

अफ़लातून ने कहा…

पद्माजी की कहानियां पढ़ने का इन्तेज़ार रहेगा । आज पांच नगरों पर सर्वेश्वर की पंक्तियां पोस्ट की हैं।इस पर मनविन्दर ने वहां पूछा,'मेरठ को क्यों भूल गये?' तो वहां आपके लेख की कड़ी दे दी ।

Arvind Mishra ने कहा…

आदरणीय विभूति नारायण राय जी के वक्तित्व कृतित्व दोनों से परिचित हूँ -

बेनामी ने कहा…

दिल दहला देने वाली घटना है !

अपने से बाहर ने कहा…

साहसी लेख है, बल्कि दुस्साहसी लेख लिखें, तो अधिक उचित होगा. धन्यवाद सर.

हरि ने कहा…

जो लोग इस लेख या विभूति जी के इस अनुभव को साहसी बता रहें हैं वह विभूति नारायण को नहीं जानते। उनके कमिटमेंट लेबल को नहीं जानते। हकीकत यही है कि ये एेसा एक दु:स्वपन है जो न जिंदगी भर विभूति जी का पीछा छोड़ेगा, न हाशिमपुरा के लोगों का आैर न उन मीडियाकर्मियों का जिन्होंने मेरठ में 1987 की त्रासदियों को कवर किया है। मैं भी एक एेसा ही इंसान हूं जिसने मेरठ के दंगों के सच को भुगता है। दिनमान के रिपोर्टर जसवीर उर्फ जस्सी जो दुर्भाग्य से इस दुनिया में नहीं हैं आैर मैं सबसे पहले मलियाना पंहुचे थे। जहां पीएसी ने अंधाधुंध गोलियां चलाकर ग्रामीणों का नरसंहार किया था। रात ग्यारह बजे वहां से लौटकर दंगे के इस सच को जस्सी ने बीबीसी में फ्लैश कराया था। मैने उसे अमर उजाला में लिखा था। लेकिन खबर प्रकाशन के लिए तमाम जद्दोजहद के बाद तभी जा सकी थी जब बीबीसी ने उसे प्रसारित कर दिया था। उसके बाद कुछ संगठनों ने अमर उजाला की प्रतियां जलाईं थीं। पत्रकारों को भुगतने की धमकी दी थी। हाशिमपुरा तो पीएसी की इंतहा थी। मैं जानता हूं कि यदि विभूति गाजियाबाद के एसएसपी न होते आैर चौथी दुनिया न होता तो हाशिमपुरा का नंगा सच कभी सामने न आता। मैं दंगे के दौरान हाशिमपुरा की घटना का काफी हद तक साक्षी रहा हूं। मैने नहर पर नरसंहार की घटना से पहले हाशिमपुरा की फायरिंग भी देखी है जब एक तरफ से पुलिस गोलियां चला रही थी तो दूसरी तरफ से दंगाई छतों पर चढ़कर बराबर का मुकाबला कर रहे थे लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि आप चंद सिरफिरे बदमाशों के लिए सामुहिक नरसंहार कर दो। मुझे याद है कि वीरेंद्र सेंगर किस तरह जान हथेली पर रखकर काम कर रहे थे। मैं जिस गली में घुसता वहां वीरेंद्र मिल जाते आैर पूछते तुम्हें पुलिस व पीएसी नहीं रोकती। लेकिन अफसोस कि आज तक हाशिमपुरा को इंसाफ नहीं मिला आैर न उन दंगाईयों को सजा जिन्होंने दंगे में निर्दोषों का खून बहाया।
विभूति जी आपको ये कांड हमेशा एक दु:स्वपन ही लगेगा। सिस्टम के आगे आप जैसा आदमी भी एक जगह पर आकर लाचार हो जाता है। यही सच है। कड़वा आैर नंगा सच।